प्रसंग क्रमांक 3
• 14 September 2026
चन्देलों का उत्कर्ष और वीरता का युग
चन्देलों के उदय, विशाल राज्य की स्थापना और भारत के उस वीरता-भरे युग की कथा, जिसमें चन्देल, चौहान, सिसोदिया और अन्य राजपूत शक्तियाँ अपने पराक्रम से इतिहास रच रही थीं। इसी युग में आगे चलकर आल्हा और ऊदल जैसे महान वीरों का जन्म हुआ।
वाचन:
चन्देलों का उत्कर्ष और वीरता का युग
शक्ति के युग में भारत की दसवीं, ग्यारहवीं शताब्दि “शक्ति” का युग था। उस युग में “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सर्वत्र शक्ति की प्रतिष्ठा थी।
भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। उस युग में कोई सार्वभौम सम्राट नहीं था। सभी राजा एक दूसरे से लड़ा-भिढ़ा करते थे। जिसकी शक्ति अधिक रहती थी, वही राजा बन बैठता था। वास्तव में भारत के लिये वह भयंकर काल था।
इसी संकटापन्न स्थिति में विदेशियों का आक्रमण आरम्भ हुआ। जिन अत्याचार एवं आक्रमणों को सिसोदिया वीर बप्पा रावल ने रोक दिया था, पुनः होने लगे। बार-बार शक हुए और यवन अपनी-अपनी सेना लेकर आक्रमण करने लगे।
इस युग में दस्युओं और लुटेरों ने बड़ा उपद्रव मचाया। उनके अत्याचार से पश्चिमोत्तर भारत भयभीत हो उठा। विदेशियों के देखादेखी मेर और अन्य पहाड़ी जातियाँ भी चारों ओर लूट-पाट मचाने लगीं। धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में अराजकता फैल गई। सर्वत्र अत्याचार का विषम तांडव होने लगा। देश का कोना-कोना दहल उठा। वीर क्षत्रिय जाति ने इस विषमता को मिटाना चाहा, परन्तु परस्पर के द्वेष से असफल हो रहे थे। स्थिति दिन-दिन बिगड़ती ही गई।
इस युग में दस्युओं और लुटेरों ने बड़ा उपद्रव मचाया। वे एकाएक रात से छापा मारते, घरों में आग लगा देते, बालकों और स्त्रियों को मार डालते और जो कुछ पाते थे, लूट लेते थे। वे बड़े निर्दयी और अपने धर्म के बड़े कट्टर थे। भारत की प्राचीन पुस्तकों को जला देते थे। मन्दिरों को तोड़ देते तथा हिन्दुओं का अमूल्य धन लूट लेते थे। उन विदेशियों ने बड़ा अत्याचार किया। सारा भारत काँप उठा। वह शक्ति का युग साक्षात् भारत का संकट-काल था।
विशाल राज्य-स्थापन
महाराज चन्द्रवर्मा का वर्णन पूर्व ही हो चुका है। उन्होंने अपने बाहुबल से चन्देल राज्य की स्थापना की थी। उनके प्रधान सहायक वीर चिन्तामणि थे। दोनों की आत्मा एक थी, परस्पर अभिन्न-हृदय मित्र थे। इन्हीं दो महान आत्माओं ने मिलकर उस शक्ति के युग में विशाल राज्य स्थापित किया था।
चन्द्रवर्मा के बाद वीरवर्मा राज्य का अधिकारी हुआ। उसने बड़ी योग्यता से बहुत वर्षों तक शासन किया। उस समय चन्देरी की बड़ी उन्नति हुई। नगरी सुन्दर अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से पूर्ण हो गई। कला-कौशलों का प्रचार होने लगा तथा व्यापार की वृद्धि हो गई। सर्वत्र सुख-शान्ति का साम्राज्य फैल गया।
इस प्रकार क्रमशः वज्रवर्मा, नन्दनवर्मा, जगवर्मा, सत्यवर्मा और सूर्यवर्मा चन्देरी के राजसिंहासन पर बैठे। सूर्यवर्मा ने बड़ी उन्नति की। प्रजा का पुत्र के समान पालन किया तथा उनके सुख के लिये आवश्यक व्यवस्था की। सूर्यवर्मा का पुत्र मदनवर्मा हुआ, जिसने मदन ताल बनवाया, जो अब तक उसी नाम से प्रसिद्ध है।
मदनवर्मा का पुत्र कीर्तिवर्मा हुआ, जिसने अपने नाम से एक सरोवर बनवाया, जिसे लोग अब तक कीर्ति सागर के नाम से पुकारते हैं।
कीर्तिवर्मा का पुत्र परमर्दिदेव हुआ। पिता की मृत्यु के समय उसकी अवस्था छोटी थी। महावीर कीर्तिवर्मा के राज्य के उत्तराधिकारी को निर्बल जान आसपास के अधीन राजाओं ने अपना सिर उठाया और स्वतंत्र हो गये। केवल चन्देरी ही चन्देलों के अधिकार में रह गई।
धीरे-धीरे परमर्दिदेव बड़ा हुआ। अपने राजा को वयस्क देख चन्देलों के शूर सामन्त एकत्र हुए और शत्रुओं से अपना राज्य लौटाने का उद्योग करने लगे। परमाल सन् 1164 ई. में राजसिंहासन पर बैठा।
वह एक बलिष्ठ और शूरवीर योद्धा था। अपनी युवावस्था में उसने सैकड़ों अभिमानी नरेशों तथा गर्वित शूरों के गर्व को चूर कर दिया। उसकी धाक मध्यभारत में ही नहीं, वरन् देश के कोने-कोने में फैल गई। दसों दिशाओं में चन्देलों के कीर्ति की दुन्दुभी बजने लगी।
कीर्तिवर्मा के मरते ही महोबा का शासक मालवन्त स्वतंत्र हो गया था। उसे दो पुत्र और पाँच पुत्रियाँ थीं।
उस समय मालवन्त की अद्वितीय सुन्दरी कन्या मल्हना के सुन्दरता की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल रही थी। वास्तव में वह अनुपम सुन्दरी थी। कवियों ने उसकी सुन्दरता का वर्णन पद्मिनी के समान किया है।
परमर्दिदेव ऐसे अवसर को कब हाथ से जाने दे सकता था? वह तत्काल ही पद्मिनी के समान सर्वांग सुन्दरी मल्हना के लिये महोबे पर चढ़ गया। यद्यपि मालवन्त के सैनिकों ने बड़ी वीरता से चन्देलों का सामना किया, परन्तु सफल न हो सके। मेघ के सम्मुख समुद्र की तरंगें क्या कर सकती थीं?
विवश हो मालवन्त ने मल्हना का विवाह परमाल से कर दिया। मल्हना चन्देरी में नहीं रहना चाहती थी। अतः उसकी प्रसन्नता के लिये वीर परमर्दिदेव ने महोबे को ही अपनी राजधानी बनायी और अपने श्वसुर को उरई में बसने की आज्ञा दी।
भारत का वीरता-भरा युग
उस अतीत काल में भारत में भिन्न-भिन्न अनेक शक्तियाँ काम कर रही थीं। एक ओर मध्य भारत में जहाँ चन्देलों का चन्द्र चमक रहा था, दूसरी ओर वहीं राजस्थान में सिसोदियों का सूर्य तप रहा था। इतना ही नहीं, उत्तर में यदि चौहानों की कीर्तिध्वजा फहरा रही थी, तो पूर्वी भारत में राठौरों की तूती बोल रही थी। भारत भिन्न-भिन्न राज्यों में बँटा था।
यह राजपूतों के उत्थान का समय था। परन्तु सुमति नहीं थी। लोग आपस में ही लड़ा-भिड़ा करते थे। प्रत्येक सरदार अपने को राजा समझता था।
कन्नौज में गहरवार, दिल्ली में तोमर, अजमेर में चौहान, बंगाल-बिहार में पाल तथा सेनवंश, मेवाड़ में गुहिलौत, गुजरात में चावड़ा, राहिरगढ़ के वाडुकुल, मालवेर के सोनगरा, पाटन के वाघेला, सिरोही के देवरा, जुनागढ़ के यादव, सीकरी के सिकरवार, अमरगढ़ के जेतवा, नरवर के कछवाहा और कालिंजर में चन्देल थे।
उस युग में क्षत्रियजाति आधीन रहना पाप समझती थी। वे अपने शत्रुओं से बदला लेना जानते थे। वीरता प्रदर्शन ही उनका ध्येय था। अपने मान की रक्षा के लिये प्राणों को उत्सर्ग कर देना उत्तम समझते थे। वीर धर्म ही सर्वस्व था। उस धर्म की रक्षा के लिये ही नित्य भीषण युद्ध हुआ करता था तथा भयंकर जन-संहार होता था।
पाठकों! प्रतापी आल्हा और ऊदल इसी युग में हुए थे। इन वीरों ने अपनी शक्तियों को देश-बन्धुओं के ही नाश में लगा दिया। यदि उस समय भारत की सभी शक्तियाँ एकत्र हो शत्रुओं का सामना करतीं, तो यवन किस खेत की मूली थे? सारा विश्व काँप उठता। इतना ही नहीं, उन महावीरों के सम्मुख देवताओं को भी नतमस्तक होना पड़ता।
तुम्हारा वह अतीत प्रांगण रूढ़ा था। उस भारतरूपी विशाल सिन्धु में वीरता की बड़ी-बड़ी आँधियाँ चल रही थीं। समुद्र गर्जन धारण कर हिल्लोरें मार रहा था। उसकी उत्ताल तरंगें दिशाओं को कम्पित कर रही थीं तथा वह स्वयं अपने निर्घोष से आकाश को कम्पित कर रहा था।
शक्ति के युग में भारत की दसवीं, ग्यारहवीं शताब्दि “शक्ति” का युग था। उस युग में “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी। सर्वत्र शक्ति की प्रतिष्ठा थी।
भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। उस युग में कोई सार्वभौम सम्राट नहीं था। सभी राजा एक दूसरे से लड़ा-भिढ़ा करते थे। जिसकी शक्ति अधिक रहती थी, वही राजा बन बैठता था। वास्तव में भारत के लिये वह भयंकर काल था।
इसी संकटापन्न स्थिति में विदेशियों का आक्रमण आरम्भ हुआ। जिन अत्याचार एवं आक्रमणों को सिसोदिया वीर बप्पा रावल ने रोक दिया था, पुनः होने लगे। बार-बार शक हुए और यवन अपनी-अपनी सेना लेकर आक्रमण करने लगे।
इस युग में दस्युओं और लुटेरों ने बड़ा उपद्रव मचाया। उनके अत्याचार से पश्चिमोत्तर भारत भयभीत हो उठा। विदेशियों के देखादेखी मेर और अन्य पहाड़ी जातियाँ भी चारों ओर लूट-पाट मचाने लगीं। धीरे-धीरे सम्पूर्ण भारत में अराजकता फैल गई। सर्वत्र अत्याचार का विषम तांडव होने लगा। देश का कोना-कोना दहल उठा। वीर क्षत्रिय जाति ने इस विषमता को मिटाना चाहा, परन्तु परस्पर के द्वेष से असफल हो रहे थे। स्थिति दिन-दिन बिगड़ती ही गई।
इस युग में दस्युओं और लुटेरों ने बड़ा उपद्रव मचाया। वे एकाएक रात से छापा मारते, घरों में आग लगा देते, बालकों और स्त्रियों को मार डालते और जो कुछ पाते थे, लूट लेते थे। वे बड़े निर्दयी और अपने धर्म के बड़े कट्टर थे। भारत की प्राचीन पुस्तकों को जला देते थे। मन्दिरों को तोड़ देते तथा हिन्दुओं का अमूल्य धन लूट लेते थे। उन विदेशियों ने बड़ा अत्याचार किया। सारा भारत काँप उठा। वह शक्ति का युग साक्षात् भारत का संकट-काल था।
विशाल राज्य-स्थापन
महाराज चन्द्रवर्मा का वर्णन पूर्व ही हो चुका है। उन्होंने अपने बाहुबल से चन्देल राज्य की स्थापना की थी। उनके प्रधान सहायक वीर चिन्तामणि थे। दोनों की आत्मा एक थी, परस्पर अभिन्न-हृदय मित्र थे। इन्हीं दो महान आत्माओं ने मिलकर उस शक्ति के युग में विशाल राज्य स्थापित किया था।
चन्द्रवर्मा के बाद वीरवर्मा राज्य का अधिकारी हुआ। उसने बड़ी योग्यता से बहुत वर्षों तक शासन किया। उस समय चन्देरी की बड़ी उन्नति हुई। नगरी सुन्दर अट्टालिकाओं तथा राजभवनों से पूर्ण हो गई। कला-कौशलों का प्रचार होने लगा तथा व्यापार की वृद्धि हो गई। सर्वत्र सुख-शान्ति का साम्राज्य फैल गया।
इस प्रकार क्रमशः वज्रवर्मा, नन्दनवर्मा, जगवर्मा, सत्यवर्मा और सूर्यवर्मा चन्देरी के राजसिंहासन पर बैठे। सूर्यवर्मा ने बड़ी उन्नति की। प्रजा का पुत्र के समान पालन किया तथा उनके सुख के लिये आवश्यक व्यवस्था की। सूर्यवर्मा का पुत्र मदनवर्मा हुआ, जिसने मदन ताल बनवाया, जो अब तक उसी नाम से प्रसिद्ध है।
मदनवर्मा का पुत्र कीर्तिवर्मा हुआ, जिसने अपने नाम से एक सरोवर बनवाया, जिसे लोग अब तक कीर्ति सागर के नाम से पुकारते हैं।
कीर्तिवर्मा का पुत्र परमर्दिदेव हुआ। पिता की मृत्यु के समय उसकी अवस्था छोटी थी। महावीर कीर्तिवर्मा के राज्य के उत्तराधिकारी को निर्बल जान आसपास के अधीन राजाओं ने अपना सिर उठाया और स्वतंत्र हो गये। केवल चन्देरी ही चन्देलों के अधिकार में रह गई।
धीरे-धीरे परमर्दिदेव बड़ा हुआ। अपने राजा को वयस्क देख चन्देलों के शूर सामन्त एकत्र हुए और शत्रुओं से अपना राज्य लौटाने का उद्योग करने लगे। परमाल सन् 1164 ई. में राजसिंहासन पर बैठा।
वह एक बलिष्ठ और शूरवीर योद्धा था। अपनी युवावस्था में उसने सैकड़ों अभिमानी नरेशों तथा गर्वित शूरों के गर्व को चूर कर दिया। उसकी धाक मध्यभारत में ही नहीं, वरन् देश के कोने-कोने में फैल गई। दसों दिशाओं में चन्देलों के कीर्ति की दुन्दुभी बजने लगी।
कीर्तिवर्मा के मरते ही महोबा का शासक मालवन्त स्वतंत्र हो गया था। उसे दो पुत्र और पाँच पुत्रियाँ थीं।
उस समय मालवन्त की अद्वितीय सुन्दरी कन्या मल्हना के सुन्दरता की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल रही थी। वास्तव में वह अनुपम सुन्दरी थी। कवियों ने उसकी सुन्दरता का वर्णन पद्मिनी के समान किया है।
परमर्दिदेव ऐसे अवसर को कब हाथ से जाने दे सकता था? वह तत्काल ही पद्मिनी के समान सर्वांग सुन्दरी मल्हना के लिये महोबे पर चढ़ गया। यद्यपि मालवन्त के सैनिकों ने बड़ी वीरता से चन्देलों का सामना किया, परन्तु सफल न हो सके। मेघ के सम्मुख समुद्र की तरंगें क्या कर सकती थीं?
विवश हो मालवन्त ने मल्हना का विवाह परमाल से कर दिया। मल्हना चन्देरी में नहीं रहना चाहती थी। अतः उसकी प्रसन्नता के लिये वीर परमर्दिदेव ने महोबे को ही अपनी राजधानी बनायी और अपने श्वसुर को उरई में बसने की आज्ञा दी।
भारत का वीरता-भरा युग
उस अतीत काल में भारत में भिन्न-भिन्न अनेक शक्तियाँ काम कर रही थीं। एक ओर मध्य भारत में जहाँ चन्देलों का चन्द्र चमक रहा था, दूसरी ओर वहीं राजस्थान में सिसोदियों का सूर्य तप रहा था। इतना ही नहीं, उत्तर में यदि चौहानों की कीर्तिध्वजा फहरा रही थी, तो पूर्वी भारत में राठौरों की तूती बोल रही थी। भारत भिन्न-भिन्न राज्यों में बँटा था।
यह राजपूतों के उत्थान का समय था। परन्तु सुमति नहीं थी। लोग आपस में ही लड़ा-भिड़ा करते थे। प्रत्येक सरदार अपने को राजा समझता था।
कन्नौज में गहरवार, दिल्ली में तोमर, अजमेर में चौहान, बंगाल-बिहार में पाल तथा सेनवंश, मेवाड़ में गुहिलौत, गुजरात में चावड़ा, राहिरगढ़ के वाडुकुल, मालवेर के सोनगरा, पाटन के वाघेला, सिरोही के देवरा, जुनागढ़ के यादव, सीकरी के सिकरवार, अमरगढ़ के जेतवा, नरवर के कछवाहा और कालिंजर में चन्देल थे।
उस युग में क्षत्रियजाति आधीन रहना पाप समझती थी। वे अपने शत्रुओं से बदला लेना जानते थे। वीरता प्रदर्शन ही उनका ध्येय था। अपने मान की रक्षा के लिये प्राणों को उत्सर्ग कर देना उत्तम समझते थे। वीर धर्म ही सर्वस्व था। उस धर्म की रक्षा के लिये ही नित्य भीषण युद्ध हुआ करता था तथा भयंकर जन-संहार होता था।
पाठकों! प्रतापी आल्हा और ऊदल इसी युग में हुए थे। इन वीरों ने अपनी शक्तियों को देश-बन्धुओं के ही नाश में लगा दिया। यदि उस समय भारत की सभी शक्तियाँ एकत्र हो शत्रुओं का सामना करतीं, तो यवन किस खेत की मूली थे? सारा विश्व काँप उठता। इतना ही नहीं, उन महावीरों के सम्मुख देवताओं को भी नतमस्तक होना पड़ता।
तुम्हारा वह अतीत प्रांगण रूढ़ा था। उस भारतरूपी विशाल सिन्धु में वीरता की बड़ी-बड़ी आँधियाँ चल रही थीं। समुद्र गर्जन धारण कर हिल्लोरें मार रहा था। उसकी उत्ताल तरंगें दिशाओं को कम्पित कर रही थीं तथा वह स्वयं अपने निर्घोष से आकाश को कम्पित कर रहा था।
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