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स्थान: चिल्ला गौहानी, तहसील बारा, जनपद प्रयागराज, उत्तर प्रदेश, भारत
ऐतिहासिक स्थल
• 07 September 2026
आल्हा-ऊदल की बैठक, चिल्ला गौहानी, प्रयागराज
आल्हा-ऊदल की बैठक चिल्ला गौहानी, तहसील बारा, जनपद प्रयागराज में स्थित एक प्राचीन पत्थर निर्मित ऐतिहासिक संरचना है। यह स्थल लोकपरंपरा में बुंदेलखंड के प्रसिद्ध वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल से जुड़ा माना जाता है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की संरक्षित स्मारकों की सूची में चिल्ला स्थित इस संरचना का उल्लेख “Large stone dwelling house said to have been the residence of the two heroes of Ala and Udal” के रूप में मिलता है और इसे लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी की संरचना के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
यह भवन बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित है तथा इसके स्थापत्य में पत्थर के स्तंभ, अलंकृत स्तंभ-मुख, बरामदा, कक्ष और चौड़ी आधार संरचना दिखाई देती है। स्थानीय रूप से इसे आल्हा-ऊदल की बैठक, आल्हा महल या आल्हा-ऊदल की कोट के नाम से भी जाना जाता है।
चिल्ला गौहानी का यह स्थल आल्हा-ऊदल की लोकगाथा, बुंदेलखंड की वीर परंपरा और प्रयागराज क्षेत्र की पुरातात्विक विरासत के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कड़ी के रूप में देखा जाता है। परिसर और आसपास के क्षेत्र में प्राचीन स्थापत्य अवशेष भी दिखाई देते हैं।
यह स्थल इतिहास, पुरातत्व, लोकसाहित्य और मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य में रुचि रखने वाले लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। इसके संरक्षण से आल्हा-ऊदल से जुड़ी स्थानीय परंपराओं और क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने में सहायता मिल सकती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की संरक्षित स्मारकों की सूची में चिल्ला स्थित इस संरचना का उल्लेख “Large stone dwelling house said to have been the residence of the two heroes of Ala and Udal” के रूप में मिलता है और इसे लगभग 8वीं शताब्दी ईस्वी की संरचना के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
यह भवन बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित है तथा इसके स्थापत्य में पत्थर के स्तंभ, अलंकृत स्तंभ-मुख, बरामदा, कक्ष और चौड़ी आधार संरचना दिखाई देती है। स्थानीय रूप से इसे आल्हा-ऊदल की बैठक, आल्हा महल या आल्हा-ऊदल की कोट के नाम से भी जाना जाता है।
चिल्ला गौहानी का यह स्थल आल्हा-ऊदल की लोकगाथा, बुंदेलखंड की वीर परंपरा और प्रयागराज क्षेत्र की पुरातात्विक विरासत के बीच एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कड़ी के रूप में देखा जाता है। परिसर और आसपास के क्षेत्र में प्राचीन स्थापत्य अवशेष भी दिखाई देते हैं।
यह स्थल इतिहास, पुरातत्व, लोकसाहित्य और मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य में रुचि रखने वाले लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है। इसके संरक्षण से आल्हा-ऊदल से जुड़ी स्थानीय परंपराओं और क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रखने में सहायता मिल सकती है।
स्रोत / सौजन्य:
फोटो स्रोत: उपलब्ध संदर्भ/स्थल फोटोग्राफ; ऐतिहासिक विवरण हेतु भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI)
मूल रेज़ोल्यूशन:
1600 × 900 पिक्सल
अभिलेख स्थिति:
प्रामाणिक डिजिटल संस्करण
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